पशुपतिनाथ व्रत की विधि एवं कथा

             पशुपतिनाथ व्रत की विधि 



नमस्कार मित्रों, आज इस लेख के माध्यम से हम आप सभी के लिए पशुपति व्रत | Pashupati Vrat ki Vidhi in Hindi  में प्रदान करने जा रहे हैं। दोस्तों आज हम इस लेख के माध्यम से आप सभी को पशुपति व्रत की संपूर्ण जानकारी प्रदान करने जा रहे हैं यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है या आप यह भी कह सकते हैं कि यह व्रत भगवान शिव से संबंधित है।


भगवान शिव दीन दयालु है इस व्रत से आपके जीवन की सभी कठिनाई समाप्त हो जाएंगी और आपका जीवन आनंद में हो जाएगा। यह व्रत मुख्य रूप से 5 सोमवार किया जाता है इस व्रत का प्रारंभ सोमवार के दिन किया जाता है इस व्रत में आपको क्या क्या सावधानियां बरतनी है और इन उपायों को करके आप भगवान शिव को खुश कर सकते हैं यह सभी जानकारी आपको इस लेख के माध्यम से मिल जाएगी।

Pashupatinath Vrat | Pashupatinath Vrat Karne Ki Vidhi


1. इस व्रत को रखने का नियम यह है कि जिस सोमवार से यह व्रत रखना है उससे एक दिन पहले ब्रह्मचर्य का पालन करें। सोमवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर नित्य कर्मों के बाद यदि आपके घर के पास कोई पवित्र नदी बह रही हो तो जाकर उसमें स्नान कर लें, नहीं तो नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल मिलाकर घर में ही स्नान करें।


2. स्नान के बाद पूजा की थाली बनाएं जिसमें धूप-दीप, शमी पत्र, बेलपत्र, भांग धतूरा, मंदार पुष्प, पंचामृत आदि भगवान शिव के मंदिर में जाएं।

3. याद रखें कि व्रत के पहले दिन आप जिस मंदिर में जाते हैं, बाकी के चार सोमवार उसी मंदिर में जाएं।

4. शिव मंदिर में जाकर घी का दीपक जलाएं। हो सके तो मिट्टी या आटे का दीपक भी बनाया जा सकता है। हो सके तो शिवलिंग के आसपास की जगह को अच्छे से साफ कर लें। अब सबसे पहले शिवलिंग पर जल चढ़ाएं।
5. जल चढ़ाते समय मन ही मन भगवान शिव के किसी मंत्र का जाप करते रहें। उसके बाद पंचाभिषेक यानी दूध, दही, घी, शहद और अंत में फिर से जल चढ़ाएं।

6. पंचाभिषेक करने के बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, मंदार के फूल आदि पूजन सामग्री चढ़ाकर मिठाई चढ़ाएं।

7. ध्यान रहे कि शिवलिंग से हमेशा धूप, दीप आदि कुछ दूरी पर रखना चाहिए। देखा गया है कि भक्त अक्सर शिवलिंग पर ही अगरबत्ती आदि लगाते हैं, जो सर्वथा अनुचित है। इसके बाद घर आकर फलाहार करें।


8. शाम को दोबारा मंदिर जाएं और 6 दीपक भी साथ ले जाएं। इनमें से 5 दीपक मंदिर में ही जला लें और आखिरी यानी छठा दीपक अपने साथ घर ले आएं। घर आकर इस दीपक को प्रवेश द्वार पर अपने दाहिने हाथ से यानी दरवाजे के दाहिने तरफ जलाएं।

9. जो मिठाई आप मंदिर ले गए थे उसे तीन भागों में बांट लें, दो भाग मंदिर में ही भोग लगाएं और तीसरा भाग घर में लाकर भगवान शिव को अर्पित कर प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। अब आप व्रत का पारण कर सकते हैं, लेकिन ध्यान रहे कि नमक का प्रयोग न करें।

10. यह क्रम लगातार पांच सोमवार तक करें। पाशुपति व्रत पांचवें सोमवार को मनाया जाता है।

Pashupati Vrat पशुपतिनाथ व्रत विधि – उपवास के दौरान रखें ये सावधानियां
1. पूजन सामग्री में शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।

2. शिवलिंग पर चढ़ाए जाने वाले पत्र, मंदार के फूल आदि साफ होने चाहिए और ध्यान रहे कि पत्ते कटे या फटे नहीं होने चाहिए।
कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सोमवार के दिन बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए, इसके लिए एक दिन पहले यानी रविवार के दिन बेलपत्र तोड़कर सुरक्षित रख लें।

3. भगवान शिव को प्रिय यह पशुपति व्रत निश्चय ही सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। व्रत के दौरान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों से दूर रहें। व्रत के दौरान भूलकर भी कभी भी तामसिक पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।

4. वैसे तो कभी भी हिंसा नहीं करनी चाहिए, लेकिन इस दौरान कभी भी इंसान या किसी जानवर के साथ हिंसक व्यवहार नहीं करना चाहिए।

5. महिलाओं और बच्चों को सम्मान दें और किसी भी प्रकार के अनावश्यक वाद-विवाद और कलह में न पड़ें।

पशुपति व्रत कब नहीं करना चाहिए | Pashupati Vrat Kab Nahi Karna Chahiye
वैसे तो कोई भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा से इस व्रत को कर सकता है, लेकिन यदि कोई बीमार है या वृद्धावस्था के कारण इस व्रत को करने में असमर्थ है तो उसे इस व्रत को नहीं करना चाहिए।

गर्भवती महिलाओं को यह व्रत नहीं करना चाहिए और मासिक धर्म के दौरान ऐसी महिलाएं अपने पति के न होने पर अपने पुत्र से पूजा का कार्य करवा सकती हैं। इनके लिए केवल पूजा विधि ही वर्जित है, अन्यथा ये व्रत भी रख सकते हैं।

Pashupati Vrat Kitne Kare | पशुपति व्रत कितने करे
मुख्य रूप से सभी को पांच व्रत करने चाहिए। बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए की जब से आप व्रत शुरू करे उस दिन सोमवार होना आवश्यक है। उसके ठीक पांच सोमवार बाद व्रत को पूर्ण करे। 

              पशुपतिनाथ व्रत कथा

भगवान पशुपति नाथ की कथा | Bhagwan Pashupatinath Ki Katha



कथा शुरू करने से पहले अपने साथ कुछ पत्र (चावल के दाने) लेकर जाएं और ये पत्र उन सभी लोगों को दें जो एक साथ सुन रहे हों औरजब कथा समाप्त हो तो इन पत्रों को मंदिर में चढ़ाएं इन्हीं इधर उधर ना फेंके।



एक बार की बात है भगवान शिव नेपाल की सुन्दर तपोभूमि से आकर्षित होकर एक बार कैलाश छोड़कर यहाँ आये और यहीं ठहरे। इस क्षेत्र में वह तीन सींग वाले हिरण (चिंकारा) के रूप में विचरण करने लगा। इसलिए इस क्षेत्र को पशुपति क्षेत्र या मृगस्थली भी कहा जाता है। शिव को इस तरह अनुपस्थित देखकर ब्रह्मा और विष्णु चिंतित हो गए और दोनों देवता भगवान शिव की खोज में निकल पड़े।


इस रमणीय क्षेत्र में उसने एक देदीप्यमान, मोहक तीन सींग वाला मृग विचरण करते देखा। उन्हें मृग रूपी शिव पर शक होने लगा। योग विद्या से ब्रह्मा जी ने तुरंत पहचान लिया कि यह मृग नहीं, बल्कि भगवान आशुतोष हैं। तुरंत ही ब्रह्मा जी उछल पड़े और मृग के सींग को पकड़ने की कोशिश करने लगे। इससे मृग के सींग के 3 टुकड़े हो गए।


उसी सिंह का एक पवित्र टुकड़ा टूटकर यहां पर भी गिर गया जिसकी वजह से यहां महारुद्र जी का जन्म हुआ जो आगे चलकर पशुपतिनाथ जी के नाम से प्रसिद्ध हुए भगवान शिव जी की इच्छा के अनुसार, भगवान विष्णु ने भगवान शिव को मोक्ष देने के बाद, नागमती के ऊंचे टीले पर एक लिंग स्थापित किया, जो पशुपति के रूप में प्रसिद्ध हुआ।



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