भगवान शिव शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं । क्या है पौराणिक कथा चलिए जानते है

 

भगवान शिव शरीर पर भस्म क्यों लगाते हैं । क्या है पौराणिक कथा चलिए जानते है 



शिव भक्तों के लिए शिवजी का हर एक रूप निराला है। कहते हैं भगवान शिव भोले हैं, क्योंकि वे अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने वाले हैं। वे अपने भक्तों के समक्ष स्वयं प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं एवं मन मुताबिक वरदान देते हैं। हिन्दू धर्म में शिव उपासना का विशेष महत्व है, कहते हैं किसी भी प्रकार की समस्या क्यों ना हो, शिवजी की मदद से सभी संकट दूर हो जाते हैं। शिवजी का जप करने से भक्त खुद में एक शक्ति को महसूस करता है। शायद इसी विश्वास के कारण भगवान शिव अपने भक्तों के बीच हर रूप में प्रसिद्ध हैं।फिर वह भोले बाबा का रूप हो या फिर शिव का रौद्र रूप। उनके भक्त शिव के हर रूप के सामने सिर झुकाकर उन्हें नमन करते हैं। कुछ समय पहले हमने एक ब्लॉग लिखा था, जिसमें यह प्रश्न उठाया गया था कि शिव भांग एवं धतूरे का सेवन क्यों करते हैं। शिव की जटाओं से गंगा क्यों बहती है? शिवजी गले में सर्प धारण क्यों करते हैं? इसी तरह से कई ऐसे सवाल हैं जो खुद में एक रहस्य हैं।

यूं तो शिव के हर रूप के पीछे कोई ना कोई रहस्य छिपा है, लेकिन इसी तरह का एक और सवाल भी उत्पन्न होता है। हिन्दू कथाओं के अनुसार कई जगह शिवजी को भस्म का प्रयोग करते हुए पाया गया है। वे अपने शरीर पर भस्म लगाते थे, ऐसा दावा किया जाता है। भस्म यानि कुछ जलाने के बाद बची हुई राख, लेकिन यह किसी धातु या लकड़ी को जलाकर बची हुई राख नहीं है। शिव जली हुई चिताओं के बाद बची हुई राख को अपने तन पर लगाते थे, लेकिन क्यों! इसका अर्थ पवित्रता में छिपा है, वह पवित्रता जिसे भगवान शिव ने एक मृत व्यक्ति की जली हुई चिता में खोजा है। जिसे अपने तन पर लगाकर वे उस पवित्रता को सम्मान देते हैं। कहते हैं शरीर पर भस्म लगाकर भगवान शिव खुद को मृत आत्मा से जोड़ते हैं। उनके अनुसार मरने के बाद मृत व्यक्ति को जलाने के पश्चात बची हुई राख में उसके जीवन का कोई कण शेष नहीं रहता। ना उसके दुख, ना सुख, ना कोई बुराई और ना ही उसकी कोई अच्छाई बचती है। इसलिए वह राख पवित्र है, उसमें किसी प्रकार का गुण-अवगुण नहीं है, ऐसी राख को भगवान शिव अपने तन पर लगाकर सम्मानित करते हैं। किंतु ना केवल भस्म के द्वारा वरन् ऐसे कई उदाहरण है जिसके जरिए भगवान शिव खुद में एवं मृत व्यक्ति में संबंध को दर्शाते हैं।

शिव भस्म मंत्र

ऐसे करें शिव भस्म का इस्तेमाल, दर्शन देंगे महाकाल
शिवजी को भस्म लगाने के बाद खुद भी भस्म लगाएं और शिव पंचाक्षर मंत्र 'ॐ नमः शिवाय' का 3 बार जाप करें. पहले भस्म को अपने मस्तक, दोनों भुजाओं और ह्रदय में लगाएं फिर कान और नाभि आदि स्थानों पर त्रिपुण्ड्र लगाएं.




क्यों शरीर पर भस्म लगाते हैं शिव? 


धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान शिव को मृत्यु का स्वामी माना गया है. इसीलिए शव से शिव नाम बना. उनके अनुसार शरीर नश्वर है और इसे एक दिन इस भस्म की तरह शरीर राख हो जाना है. जीवन के इसी पड़ाव का भगवान शिव सम्मान करते हैं और इस सम्मान को वो खुदपर भस्म लगाकर जताते हैं.

शिवजी को भस्म चढ़ाने के पीछे पौराणिक मान्यता

क्या है इसके पिछे की मान्यता ?



दरअसल भगवान शिव शंकर को भोलेनाथ कहा जाता है। नाथ साधु सन्यासियों का एक संप्रदाय भी है जो मच्छन्द्र नाथ व गोरख से होते हुए नवनाथ के रूप में प्रचलित भी हुआ । 84 सिद्ध भी हुए हैं इन्हीं में सबसे पहले यानि आदि नाथ भगवान शिव को माना जाता है। इस संप्रदाय के लोग भी अक्सर भस्म रमाये मिलते होंगे। साधु सन्यासी तो अपने तन से लेकर जटाओं तक में धूणी यानि की धूणे की भस्म लगाये मिल जाते हैं। लेकिन भगवान शिव ने अपने तन पर जो भस्म रमाई है वह किसी धूणे की नहीं बल्कि उनकी पहली पत्नी सती की चिता की भस्म थी जो कि अपने पिता द्वारा भगवान शिव के अपमान से आहत हो वहां हो रहे यज्ञ के हवनकुंड में कूद गई थी। मान्यता है कि भगवान शिव को जब इसका पता चला तो वे बहुत बेचैन हो गये। जलते कुंड से सती के शरीर को निकालकर प्रलाप करते हुए ब्रह्माण्ड में घूमते रहे। उनके क्रोध व बेचैनी से सृष्टि खतरे में पड़ गई। कहते हैं तब श्री हरि ने सती के शरीर को भस्म में परिवर्तित कर दिया कोई चारा न देख शिव ने भस्म को ही उनकी अंतिम निशानी के तौर पर अपने तन पर मल लिया।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं में ही यह वर्णन भी मिलता है कि भगवान श्री हरि ने देवी सती के शरीर को भस्म ने नहीं बदला अपितु उसे छिन्न भिन्न कर दिया था जिसके बाद जहां जहां उनके अंग गिरे वहीं शक्तिपीठों की स्थापना हुई। भगवान शिव के तन पर भस्म रमाने का एक रहस्य यह भी बताया जाता है कि राख विरक्ति का प्रतीक है। भगवान शिव चूंकि बहुत ही लौकिक देव लगते हैं। कथाओं के माध्यम से उनका रहन-सहन एक आम सन्यासी सा लगता है। एक ऐसे ऋषि सा जो गृहस्थी का पालन करते हुए मोह माया से विरक्त रहते हैं और संदेश देते हैं कि अंत काल सब कुछ राख हो जाना है। इसलिये इस भस्म को रमा लो। ताकि किसी भी प्रकार के लोभ-लालच, मोह-माया में न पड़कर अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए प्रभु को समर्पित रहें।









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